Sunday, February 21, 2021

कविवर सोहनलाल द्विवेदी

आज ही के दिन राष्ट्रकवि पं सोहनलाल द्विवेदी (22 फरवरी 1906 - 1 मार्च 1988) का अवतरण हुआ था। आपने अपनी प्रेरक रचनाओं से हिंदी को एक नया आकाश दिया। आपकी इन पंक्तियों ने देश के करोड़ों युवाओं को प्रेरित किया हैं । 


'लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती 

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती'



उनकी एक और रचना-


श्रद्धेय सोहनलाल द्विवेदी जी ने राष्ट्र की नयी पीढ़ी के निर्माण का साहित्यसृजन किया ।उनकी रचनाएँ सामयिक और सार्वकालिक महत्व की है ।गाँधीजी से संबंधित भी उनकी कविताएँ है ,उनमें ..युग पुरुष..उल्लेखनीय है,1956 में पढ़ी उसकी कुछ पंक्तियाँ पढ़िये..

चल पड़े जिधर दो डग

मग में चल पड़े..

कोटि पग उसी  ओर।

जिसके सिर पर निज..

धरा हाथ उसकेसिर रक्षक..

कोटि हाथ।

जिस पर निज मस्तक झुकादिया..

झुक गये उसी पर ..

कोटि माथ।।उनकी कृतियाँ हमेशा पठनीय और प्रसंगिक रहेंगी ।सादर नमन


आपकी रचनाएँ ओज और चेतना से भरपूर थीं।आपने 'वीर तुम बढ़े चलो' जैसी बालोपयोगी रचनाएँ भी लिखीं हैं। वर्ष 1969 में भारत सरकार ने आपके कृतित्व को पद्मश्री से सम्मानित किया।




#समृद्धभारत #समृद्धहिंदी

जीवन का अनुभव

 http://epaper.amritvichar.com/media/2021-02/magazine.pdf

महाराजा दशरथ को जब संतान प्राप्ति नहीं हो रही थी तब वो बड़े दुःखी रहते थे...पर ऐसे समय में उनको एक ही बात से हौंसला मिलता था जो कभी उन्हें आशाहीन नहीं होने देता था और वह था श्रवण कुमार के माता-पिता द्वारा दिया गया श्राप....


दशरथ जब-जब दुःखी होते थे तो उन्हें श्रवण कुमार के पिता का दिया श्राप याद आ जाता था... (कालिदास ने रघुवंशम में इसका वर्णन किया है)


श्रवण कुमार के पिता ने ये श्राप दिया था कि ''जैसे मैं पुत्र वियोग में तड़प-तड़प के मर रहा हूँ वैसे ही तू भी तड़प-तड़प कर मरेगा.....''


दशरथ को पता था कि ये श्राप अवश्य फलीभूत होगा और इसका मतलब है कि मुझे इस जन्म में तो जरूर पुत्र प्राप्त होगा.... (तभी तो उसके शोक में मैं तड़प-तड़प के मरूँगा)


यानि यह श्राप दशरथ के लिए संतान प्राप्ति का सौभाग्य लेकर आया....


ऐसी ही एक घटना वानरराज सुग्रीव के साथ भी हुई....


वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि सुग्रीव जब माता सीता की खोज में वानर वीरों को पृथ्वी की अलग - अलग दिशाओं में भेज रहे थे.... तो उसके साथ-साथ उन्हें ये भी बता रहे थे कि किस दिशा में तुम्हें कौन सा स्थान या देश  मिलेगा और किस दिशा में तुम्हें जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिये.... 


प्रभु श्रीराम सुग्रीव का ये भौगोलिक ज्ञान देखकर हतप्रभ थे...


उन्होंने सुग्रीव से पूछा कि सुग्रीव तुमको ये सब कैसे पता...?


तो सुग्रीव ने उनसे कहा कि... ''मैं बाली के भय से जब मारा-मारा फिर रहा था तब पूरी पृथ्वी पर कहीं शरण न मिली... और इस चक्कर में मैंने पूरी पृथ्वी छान मारी और इसी दौरान मुझे सारे भूगोल का ज्ञान हो गया....''


अब अगर सुग्रीव पर ये संकट न आया होता तो उन्हें भूगोल का ज्ञान नहीं होता और माता जानकी को खोजना कितना कठिन हो  जाता...


इसीलिए किसी ने बड़ा सुंदर कहा है :-


"अनुकूलता भोजन है, प्रतिकूलता विटामिन है और चुनौतियाँ वरदान है और जो उनके अनुसार व्यवहार करें.... वही पुरुषार्थी है...."


ईश्वर की तरफ से मिलने वाला हर एक पुष्प अगर वरदान है.......तो हर एक काँटा भी वरदान ही समझें....


मतलब.....अगर आज मिले सुख से आप खुश हो...तो कभी अगर कोई दुख,विपदा,अड़चन आजाये.....तो घबरायें नहीं.... क्या पता वो अगले किसी सुख की तैयारी हो....


संकलन


डॉ साकेत सहाय